..........................बहुत हैं
जानते हैं कि आप खूबसुरत बहुत हैं .
लेकिन आपसे भी खूबसुरत बहुत हैं .
मुश्किलो से मिलता है इंसान कोई .
हाँ इंसानों की शक्ल में हैवान बहुत हैं .
क्या जरूरत है तलवार उठाने की ?
कत्ल के लिए दो अलफ़ाज़ बहुत हैं .
फ़िज़ूल वक़्त गुजारना क्यूँ नमाज में ?
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाना बहुत है .
ज्यादा की हवस नही रखिये दिमाग में .
आदमी को झोपड़े का आशियाँ बहुत है .
कुत्तो से सीख लीजिये वफा की अदा ,
इन आदमियों से कुत्ते बेहतर बहुत है .
मैं नही मांगता घर में चाँद की चांदनी ,
मुझे तो एक "दीपक" की रौशनी बहुत है
लेकिन आपसे भी खूबसुरत बहुत हैं .मुश्किलो से मिलता है इंसान कोई .
हाँ इंसानों की शक्ल में हैवान बहुत हैं .
क्या जरूरत है तलवार उठाने की ?
कत्ल के लिए दो अलफ़ाज़ बहुत हैं .
फ़िज़ूल वक़्त गुजारना क्यूँ नमाज में ?
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाना बहुत है .
ज्यादा की हवस नही रखिये दिमाग में .
आदमी को झोपड़े का आशियाँ बहुत है .
कुत्तो से सीख लीजिये वफा की अदा ,
इन आदमियों से कुत्ते बेहतर बहुत है .
मैं नही मांगता घर में चाँद की चांदनी ,
मुझे तो एक "दीपक" की रौशनी बहुत है
Nice poem
जवाब देंहटाएंVery Good dear.......
जवाब देंहटाएंSumit
awsuumm wrk done ..!!
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