मेरी माँ

                     मेरी माँ

उस देवी के चरणों मे श्रद्दा के फूल चढ़ाता हू.
एक धागा हू जिसके दामन का ,माँ जिसको मै कहता हू .

धूप मे दी आँचल की छाँव जाडो मे दी गोद की गर्मी .
दूध पिला कर हिम्मत भर दी दुनिया से लड सकता हू .

खुद भूखे रह कर मुझे खिलाया,क़र्ज़ है ये तेरा मुझ पर .
वक़्त पड़ा तो दिखला दूंगा मै तुझ पे मर सकता हू .

घूँट पिये अपमान के तुने ,तू जीती रही अंधेरो मे.
आज वक़्त है राह में तेरी दीपक बन जल सकता हू.

टिप्पणियाँ

  1. नि:शब्द है

    वो सुकून
    जो मिलता है
    माँ की गोदि मे
    सर रख कर सोने मे

    वो अश्रु
    जो बहते है
    माँ के सीने से
    चिपक कर रोने मे

    वो भाव
    जो बह जाते है अपने ही आप

    वो शान्ति
    जब होता है ममता से मिलाप

    वो सुख
    जो हर लेता है
    सारी पीडा और उलझन

    वो आनन्द
    जिसमे स्वच्छ
    हो जाता है मन

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