मेरी वफ़ा

वो सगा   अपनी   मजबूरियों  का  था, मेरी   वफ़ा   मेरी   बेचैनिया    थी।
उसने सपने भी खुली आँखों से देखे , मुझे ख्वाबो मैं भी आती कहानियां थी।
उसको साफ़ जिंदगी के फलसफे थे , मेरी जिंदगी नज्म , गजल और रुबाईयाँ थी।
उसने ढूँढ ही लिया एक शख्स मुक्कमल, हम में शामिल जहां की बुराइयां थी।

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